बाबू जी की तनख्वाह कम पड़ गई थी, 40 हजार का “एक्स्ट्रा” लेते लोकायुक्त के हाथ लग गए
कलेक्ट्रेट परिसर में बने जनजाति कार्य विभाग के दफ्तर में गुरुवार शाम हुई इस कार्रवाई के बाद पूरे जिले में चर्चा है कि आखिर बकाया वेतन के नाम पर कितनी बार ऐसा खेल चलता रहा।
सरकारी दफ्तर में फाइल आगे बढ़ाने के लिए अगर कोई पैसे मांगे, तो आम आदमी के पास अक्सर दो ही रास्ते होते हैं, चुप रहकर पैसे दे दो या हिम्मत करके शिकायत करो। सीधी के अशोक योगी ने दूसरा रास्ता चुना, और उसी का नतीजा गुरुवार शाम कलेक्ट्रेट परिसर में देखने को मिला, जब लोकायुक्त पुलिस ने जनजाति कार्य विभाग के दफ्तर में 40 हजार रुपये की रिश्वत लेते एक कर्मचारी को रंगे हाथों पकड़ लिया।
लोकायुक्त पुलिस की 15 सदस्यीय टीम ने यह कार्रवाई अशोक योगी की शिकायत पर की। जानकारी के अनुसार, जिस कर्मचारी को पकड़ा गया, उसकी पहचान संजय सिंह के रूप में हुई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्हें दोबारा नौकरी पर रखने और उनका पुराना बकाया वेतन दिलाने के बदले रकम मांगी जा रही थी।
50 हजार की मांग, 10 हजार पहले दिए, 40 हजार की बारी आई
लोकायुक्त निरीक्षक नरेश बेहरा के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने बताया था कि उनसे कुल 50 हजार रुपये मांगे गए थे। इसमें से 10 हजार रुपये वे पहले ही दे चुके थे, जबकि शेष 40 हजार रुपये देना बाकी था। जब परेशानी बढ़ने लगी तो उन्होंने लोकायुक्त पुलिस से संपर्क किया। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच की और ट्रैप की योजना बनाई।
गुरुवार शाम करीब 6:30 बजे अशोक योगी जनजाति कार्य विभाग के दफ्तर पहुंचे और संजय सिंह को 40 हजार रुपये दिए। यह लेनदेन होते ही पहले से तैयार लोकायुक्त की टीम ने कार्रवाई की और रकम के साथ आरोपी को पकड़ लिया। इसके बाद आरोपी को सर्किट हाउस ले जाया गया, जहां आगे की वैधानिक प्रक्रिया शुरू हुई।
कुछ स्थानीय रिपोर्टों में इस प्रकरण को भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2) के तहत दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक जानकारी है, और मामले की पूरी तस्वीर अदालत और जांच एजेंसी की कार्रवाई से ही साफ होगी।
सेवा से बाहर चल रहे कर्मचारी का मामला
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, अशोक योगी पहले रसोइये के पद पर काम करते थे, लेकिन करीब तीन साल से वे काम पर नहीं आ रहे थे। उनका कहना है कि उन्हें दोबारा काम पर रखने और पुराना वेतन दिलाने के लिए ही पैसों की मांग की गई। यानी जिस व्यक्ति के पास नौकरी और वेतन दोनों की उम्मीद थी, उसी से सीधे रकम मांगी गई। यह बात सुनने में जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही गंभीर भी है, क्योंकि सरकारी प्रक्रिया में कोई भी फैसला आम नागरिक से पैसे लेकर नहीं होना चाहिए।
कुछ रिपोर्टों में संजय सिंह का पूरा नाम संजय सिंह चौहान और उनका पद प्रभारी मंडल संयोजक बताया गया है, जबकि कुछ जगह उन्हें सिर्फ कर्मचारी कहा गया है। इसलिए आधिकारिक पुष्टि के लिए लोकायुक्त पुलिस के बयान का इंतजार करना सही होगा।
अधीक्षिका की भूमिका भी जांच के घेरे में
इस मामले में कन्या शिक्षा परिसर सीधी की प्रभारी अधीक्षिका सुनीता पांडे का नाम भी सामने आया है। शिकायत के अनुसार, नौकरी और पुराने वेतन के भुगतान के नाम पर पैसों की मांग में उनकी भूमिका होने का आरोप लगाया गया है। लोकायुक्त निरीक्षक ने भी माना है कि उनकी भूमिका सामने आई है, लेकिन अभी यह केवल आरोप है और जांच जारी है। किसी के बारे में पक्की राय बनाने से पहले जांच के नतीजों का इंतजार करना ही ठीक रहेगा।
लोकायुक्त पुलिस फिलहाल मामले से जुड़े सभी तथ्यों और संबंधित लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। संजय सिंह के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है, जबकि अधीक्षिका और शिकायत में लगाए गए बाकी आरोपों की असली स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगी।
सीधी का यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि सरकारी दफ्तरों में काम करवाने के लिए पैसे मांगने की शिकायत मिलने पर सीधे लोकायुक्त या संबंधित पुलिस थाने में संपर्क करना सबसे सही रास्ता है। अगर किसी को भी ऐसी मांग का सामना करना पड़े, तो रकम देने के बजाय शिकायत दर्ज कराना ही आगे बढ़ने का सही तरीका है।

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